आम आदमी
मेरी जुबाँ... जुबाँ एक कवी की, एक मतदाता की
जुबाँ एक आम आदमी की, और जुबाँ भारत माता की
आज एक सच उगलना चाहती है...
एक ऐसा सच, जो कडवा कठोर हो
असहनीय और कष्टप्रद हो... किन्तु सच है
जिसे कई बार चाहकर भी नहीं बताया गया,
न उजागर हुआ और ना ही जताया गया
सुनकर सभीको हैरानी होगी,
संभव है की गुस्सा भी आये
पर सच आखिर सच है
आज नहीं तो कल सामने आना ही है
इससे अच्छा है की आज कह देता हूँ... मन हल्का हो जायेगा...
तो सुनिए जनाब...
मैं किससे डरता नहीं...... पर निडरता बयां करता भी नहीं
सहता हूँ हर अन्याय को... पर कभी शिकायत करता नहीं
देशमें चल रही मनमानी को.... देखता हूँ पर विचारता नहीं
देश कइ लिए मर- मिटने की तमन्ना है.... पर वास्तव में मरता नहीं
क्रन्तिकारी विचारोंका झरना हूँ... पर कभी बहता नहीं
विचारोंका काफिला तो है सीनेमें... पर कभी पलभर रुकता नहीं
इतनी सभी खुभियाँ हैं मुझमें... फिरभी मैं एक आम आदमी हूँ...
न कुछ सोचता हूँ, न कुछ करता हूँ, न कुछ बोलता हूँ, न कुछ चाहता हूँ, न कुछ मांगता हूँ...
बस आखें, कान और जुबाँ बंद किये बैठा हूँ....
उस महात्मा के नाम से आंसू baha रहा हूँ...
क्योंकि.... मैं सिर्फ एक आम आदमी हूँ.....